जयंत
की कुटिलता और फल प्राप्ति
* एक
बार चुनि कुसुम सुहाए।
निज कर भूषन राम
बनाए॥
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥2॥
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥2॥
भावार्थ
: एक बार सुंदर फूल
चुनकर श्री रामजी ने
अपने हाथों से भाँति-भाँति
के गहने बनाए और
सुंदर स्फटिक शिला पर बैठे
हुए प्रभु ने आदर के
साथ वे गहने श्री
सीताजी को पहनाए॥2॥
* सुरपति
सुत धरि बायस बेषा।
सठ चाहत रघुपति बल
देखा॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥3॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥3॥
भावार्थ
: देवराज इन्द्र का मूर्ख पुत्र
जयन्त कौए का रूप
धरकर श्री रघुनाथजी का
बल देखना चाहता है। जैसे महान
मंदबुद्धि चींटी समुद्र का थाह पाना
चाहती हो॥3॥
*सीता
चरन चोंच हति भागा।
मूढ़ मंदमति कारन कागा॥
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥4॥
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥4॥
भावार्थ
: वह मूढ़, मंदबुद्धि कारण से (भगवान
के बल की परीक्षा
करने के लिए) बना
हुआ कौआ सीताजी के
चरणों में चोंच मारकर
भागा। जब रक्त बह
चला, तब श्री रघुनाथजी
ने जाना और धनुष
पर सींक (सरकंडे) का बाण संधान
किया॥4॥
दोहा
:
* अति
कृपाल रघुनायक सदा दीन पर
नेह।
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह॥1॥
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह॥1॥
भावार्थ
: श्री रघुनाथजी, जो अत्यन्त ही
कृपालु हैं और जिनका
दीनों पर सदा प्रेम
रहता है, उनसे भी
उस अवगुणों के घर मूर्ख
जयन्त ने आकर छल
किया॥1॥
चौपाई:
*प्रेरित
मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस
भय पावा॥
धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥1॥
धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥1॥
भावार्थ
: मंत्र से प्रेरित होकर
वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर
भाग चला। वह अपना
असली रूप धरकर पिता
इन्द्र के पास गया,
पर श्री रामजी का
विरोधी जानकर इन्द्र ने उसको नहीं
रखा॥1॥
*भा
निरास उपजी मन त्रासा।
जथा चक्र भय रिषि
दुर्बासा॥
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥2॥
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥2॥
भावार्थ
: तब वह निराश हो
गया, उसके मन में
भय उत्पन्न हो गया, जैसे
दुर्वासा ऋषि को चक्र
से भय हुआ था।
वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों
में थका हुआ और
भय-शोक से व्याकुल
होकर भागता फिरा॥2॥
*काहूँ
बैठन कहा न ओही।
राखि को सकइ राम
कर द्रोही ॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥3॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥3॥
भावार्थ
: (पर रखना तो दूर
रहा) किसी ने उसे
बैठने तक के लिए
नहीं कहा। श्री रामजी
के द्रोही को कौन रख
सकता है? (काकभुशुण्डिजी कहते
हैं-) है गरुड़ ! सुनिए,
उसके लिए माता मृत्यु
के समान, पिता यमराज के
समान और अमृत विष
के समान हो जाता
है॥3॥
*मित्र
करइ सत रिपु कै
करनी। ता कहँ बिबुधनदी
बैतरनी॥
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥4॥
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥4॥
भावार्थ
: मित्र सैकड़ों शत्रुओं की सी करनी
करने लगता है। देवनदी
गंगाजी उसके लिए वैतरणी
(यमपुरी की नदी) हो
जाती है। हे भाई!
सुनिए, जो श्री रघुनाथजी
के विमुख होता है, समस्त
जगत उनके लिए अग्नि
से भी अधिक गरम
(जलाने वाला) हो जाता है॥4॥
*नारद
देखा बिकल जयंता। लगि
दया कोमल चित संता॥
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही॥5॥
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही॥5॥
भावार्थ
: नारदजी ने जयन्त को
व्याकुल देखा तो उन्हें
दया आ गई, क्योंकि
संतों का चित्त बड़ा
कोमल होता है। उन्होंने
उसे (समझाकर) तुरंत श्री रामजी के
पास भेज दिया। उसने
(जाकर) पुकारकर कहा- हे शरणागत
के हितकारी! मेरी रक्षा कीजिए॥5॥
*आतुर
सभय गहेसि पद जाई। त्राहि
त्राहि दयाल रघुराई॥
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहीं पाई॥6॥
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहीं पाई॥6॥
भावार्थ
: आतुर और भयभीत जयन्त
ने जाकर श्री रामजी
के चरण पकड़ लिए
(और कहा-) हे दयालु रघुनाथजी!
रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। आपके अतुलित बल
और आपकी अतुलित प्रभुता
(सामर्थ्य) को मैं मन्दबुद्धि
जान नहीं पाया था॥6॥
*निज
कृत कर्म जनित फल
पायउँ। अब प्रभु पाहि
सरन तकि आयउँ॥
सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥7॥
सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥7॥
भावार्थ
: अपने कर्म से उत्पन्न
हुआ फल मैंने पा
लिया। अब हे प्रभु!
मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपकी शरण
तक कर आया हूँ।
(शिवजी कहते हैं-) हे
पार्वती! कृपालु श्री रघुनाथजी ने
उसकी अत्यंत आर्त्त (दुःख भरी) वाणी
सुनकर उसे एक आँख
का काना करके छोड़
दिया॥7॥
सोरठा
:
*कीन्ह
मोह बस द्रोह जद्यपि
तेहि कर बध उचित।
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥2॥
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥2॥
भावार्थ
: उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिए
यद्यपि उसका वध ही
उचित था, पर प्रभु
ने कृपा करके उसे
छोड़ दिया। श्री रामजी के
समान कृपालु और कौन होगा?॥2॥
चौपाई
:
*रघुपति
चित्रकूट बसि नाना। चरित
किए श्रुति सुधा समाना॥
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥1॥
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥1॥
भावार्थ
: अमृत के समान (प्रिय)
हैं। फिर (कुछ समय
पश्चात) श्री रामजी ने
मन में ऐसा अनुमान
किया कि मुझे सब
लोग जान गए हैं,
इससे (यहाँ) बड़ी भीड़ हो
जाएगी॥1॥